कुछ तो लोग कहेंगे…
कुछ तो लोग कहेंगे … जी हाँ बात कुछ इस प्रकार है कि अब तो मुझे डर लगना शुरु हो गया है.बहुत डर जाती हूँ.अक्सर डर की वजह से न घर से निकल पाती हूँ ना दोस्त बना पाती हूँ.अजीब सा डर है.कभी कभी ये डर आगे बढने की हिम्मत भी देता है और रास्ते का रोड़ा भी बन जाता हैं.पता चलता है जब एक आम लडकी आगे बढने के लिए कदम उठाती है तो ये समाज उसके चरित्र पर बिना काम के खाली बैठे दूसरों की सफ़लता से जले भुने बैठे लोग कीचड उछालने के लिए तैयार रहते है.समाज बनता किससे है ? हम लोगो से ही.मजा आता है कहने वालो को भी और सुनने वालो को भी और इस बात को आग की तरह फैला देने का जिम्मा कंधो पर उठाये लोगो को भी. अब किसी ने कुछ कहा है तो कुछ सच्चाई तो होगी ही भले ही उस सच्चाई को ठीक से देखा ही न गया हो या सिर्फ अफ़वाह के बाजार में फैलाने के लिए जरुरी है. अब हूँ तो लडकी ही...कितनी भी हिम्मत दिखाऊ पर कही न कही उस चोट के दर्द से टूट भी तो जाऊँगी.मानसिक तनाव से भी गुज़रना पड़ेगा. हो सकता है कि रो रोकर कई रातें भी काली हों , हो सकता है कि काम करना ही बंद कर दूँ या हो सकता है कि इतनी बिगड़ जाऊं कि सम्हालने की स्थिति...