Posts

कुछ तो लोग कहेंगे…

Image
कुछ तो लोग कहेंगे … जी हाँ बात कुछ इस प्रकार है कि अब तो मुझे डर लगना शुरु हो गया है.बहुत डर जाती हूँ.अक्सर डर की वजह से न घर से निकल पाती हूँ ना दोस्त बना पाती हूँ.अजीब सा डर है.कभी कभी ये डर आगे बढने की हिम्मत भी देता है और रास्ते का रोड़ा भी बन जाता हैं.पता चलता है जब एक आम लडकी आगे बढने के लिए कदम उठाती है तो ये समाज उसके चरित्र पर बिना काम के खाली बैठे दूसरों की सफ़लता से जले भुने बैठे लोग कीचड उछालने के लिए तैयार रहते है.समाज बनता किससे है ? हम लोगो से ही.मजा आता है कहने वालो को भी और सुनने वालो को भी और इस बात को आग की तरह फैला देने का जिम्मा कंधो पर उठाये लोगो को भी. अब किसी ने कुछ कहा है तो कुछ सच्चाई तो होगी ही भले ही उस सच्चाई को ठीक से देखा ही न गया हो या सिर्फ अफ़वाह के बाजार में फैलाने के लिए जरुरी है. अब हूँ तो लडकी ही...कितनी भी हिम्मत दिखाऊ पर कही न कही उस चोट के दर्द से टूट भी तो   जाऊँगी.मानसिक तनाव से भी गुज़रना पड़ेगा. हो सकता है कि रो रोकर कई रातें भी काली हों , हो सकता है कि काम करना ही बंद कर दूँ या हो सकता है कि इतनी बिगड़ जाऊं कि सम्हालने की स्थिति...

जबाब

Image
सवालो के दायरे में जबाब बसते है, समाज के सवाल हमेशा से एक जैसे थे... आज की लड़की का जबाब कुछ बदल गया है...   पहले पडता था फर्क तुम्हारे कहने से, अब आजादी में सांस लेना तुमसे ज्यादा जरुरी है. कभी चाहिए था हाथ सहारे के लिए अब कहो तो हाथ बढा सकती हूँ सहारा देने के लिए, कभी खुलकर   हँसना भी था गुनाह तुम्हारी नज़र में, आज हसाने का दम रखती हूँ. कभी चाही थी तुमने अग्निपरिक्षा हर कदम पर, आज तुमसे सवाल कर पाने की ताकत रखती हूँ। तुम कहते हो बंधन हमारी सुरक्षा है लेकिन क्या कहोगें जब घर में ही बेआबरु होते है हम. मेरी जिन्दगी का हक एक आदमी को देना कैसे जाय़ज लगा तुम्हे ? शादी न करने की ज़िद पर तुम सब मिलकर मुझे ताने मारते हो और कहते हो शादी करने का फैसला मेरा था. अरे फैसला करने का हक था ही कब..ये सब तुम्हारे नियम है जो तुम्हारी सहूलियन के हिसाब से बदल जाया करते है जानते हो एक अच्छी बात क्या है , मैंने तुम्हारी सुनना ही बंद कर दिया है. मेरा दिल अगर कहेगा सही तो वो सही और कहेगा ग़लत तो मेरे क़दम ज़रूर रुक जायेंगे. तुमसे पूछना तो कबका छोड़ दिया मैंने लेकिन बताना भी अब छोड़ रह...

बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले....

Image
अरमानों से भरी ख़्वाहिशो की पोटली को संजो को कर रखा था कभी-कभी लगता है , कि ये ख़्वाहिशे कब पूरी होंगी हर पल एक ख़्याल   मेरे जहन में आता है , कि अगर में किसी (राजा की बेटी या Princess ) होती तो अपनी छड़ी से   अपनी सारी ख़वाहिशें को   पूरी कर लेती पर में कोई Princess  नहीं हूँ.   ख़्वाहिशें   बचपन से शुरू होती है   जो कभी थमने का नाम नहीं लेती। बचपन था तब सोचते थे की काश   मेरे Daddy   मेरे   लिए   वो गुडियाँ   ले आते जो मुझे   पसंद है ? कभी यह सोचा था कि जो में गुडियाँ पाने की ख़्वाहिश कर रही हूँ  ?  मुझे मिलेगी या नहीं क्योंकि न तो मेरे पास उस गुडियाँ को लाने के लिए कोई Princess वाली छडी न कोई राजा तब बस   मन में एक ही ख़्याल आया कि कुछ ख़्वाहिशे सोचने से पूरी नहीं   होती क्या? एक   लड़की की जिन्दगी की ख़्वाहिश स्कूल , कालेज , अच्छी नौकरी , शादी के सपने बस यही ख़्वाहिशे लेकर जीना है नहीं   कभी -कभी दिल कहता है कि क्या इन ख़्वाहिशो को ही मैने अपने लिए सोचा   था। बिल्कुल नही ...