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बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले....

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अरमानों से भरी ख़्वाहिशो की पोटली को संजो को कर रखा था कभी-कभी लगता है , कि ये ख़्वाहिशे कब पूरी होंगी हर पल एक ख़्याल   मेरे जहन में आता है , कि अगर में किसी (राजा की बेटी या Princess ) होती तो अपनी छड़ी से   अपनी सारी ख़वाहिशें को   पूरी कर लेती पर में कोई Princess  नहीं हूँ.   ख़्वाहिशें   बचपन से शुरू होती है   जो कभी थमने का नाम नहीं लेती। बचपन था तब सोचते थे की काश   मेरे Daddy   मेरे   लिए   वो गुडियाँ   ले आते जो मुझे   पसंद है ? कभी यह सोचा था कि जो में गुडियाँ पाने की ख़्वाहिश कर रही हूँ  ?  मुझे मिलेगी या नहीं क्योंकि न तो मेरे पास उस गुडियाँ को लाने के लिए कोई Princess वाली छडी न कोई राजा तब बस   मन में एक ही ख़्याल आया कि कुछ ख़्वाहिशे सोचने से पूरी नहीं   होती क्या? एक   लड़की की जिन्दगी की ख़्वाहिश स्कूल , कालेज , अच्छी नौकरी , शादी के सपने बस यही ख़्वाहिशे लेकर जीना है नहीं   कभी -कभी दिल कहता है कि क्या इन ख़्वाहिशो को ही मैने अपने लिए सोचा   था। बिल्कुल नही ...